Tuesday, January 27, 2015

बाल गजल

नानी गेलै देखै लेए बारीमे आलू
लाइ उठा क' ओकर भगलै लालू

आँखि मुनि चारमे बेंग नुकाबै छै
कालू कौआ बनल कतेक छै चालू

केहेन होइ छै ई भोटक नाटक
बनि गेलै राज मंत्री चोरबा कालू

झट पट नेना सभ दौड़ क' आबै
देखही देखही कते नचै छै भालू

' दे नानी आब 'मनु'केँ दू रुपैया
नै सोचै मनमे कोना एकरा टालू

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)
जगदानन्द झा 'मनु'

Sunday, August 24, 2014

८३म सगर राति दीप जरय नन्द विलास रायक संयोजकत्व मे भपटियाहीमे ३० अगस्त संध्या ६ बजे सँ ३१ अगस्त भोर ६ बजे धरि आयोजित अछि। ई आयोजन नारी केन्द्रित लघु आ विहनि कथापर आयोजित अछि। अहाँ सादर आमंत्रित छी।

८३म सगर राति दीप जरय नन्द विलास रायक संयोजकत्व मे भपटियाहीमे ३० अगस्त संध्या ६ बजे सँ ३१ अगस्त भोर ६ बजे धरि आयोजित अछि। ई आयोजन नारी केन्द्रित लघु आ विहनि कथापर आयोजित अछि। अहाँ सादर आमंत्रित छी।

८३म सगर राति दीप जरय नन्द विलास रायक संयोजकत्व मे भपटियाहीमे ३० अगस्त संध्या ६ बजे सँ ३१ अगस्त भोर ६ बजे धरि आयोजित अछि। ई आयोजन नारी केन्द्रित लघु आ विहनि कथापर आयोजित अछि। अहाँ सादर आमंत्रित छी।

८३म सगर राति दीप जरय नन्द विलास रायक संयोजकत्व मे भपटियाहीमे ३० अगस्त संध्या ६ बजे सँ ३१ अगस्त भोर ६ बजे धरि आयोजित अछि। ई आयोजन नारी केन्द्रित लघु आ विहनि कथापर आयोजित अछि। अहाँ सादर आमंत्रित छी।

विदेह भाषा सम्मान (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान) २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह) २०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास) २०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह) २०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो- तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद)

विदेह भाषा सम्मान
(समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान)
२०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह)
२०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास)
२०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह)
२०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो-  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद)

Monday, May 26, 2014

होली एलै

होली एलै होली एलै
सबहक मोनमे खुशी जगेलै
रंग बिरंगक सपना अछि अनने
वसन्तक हबा संग झूमि एलै।

सीरक तोसक दूर भगा कए
डारि पातकेँ हरियर केलक
अँगना दौढ़ीमे फूल फुला कए
चाहुदिस हँसैत होली एलै।

धिया किनलनि फुचुक्का
नेना रंग आओर गुलाल
हाट बाजारमे हल्ला भेल छै
सबतरि भरल अबीर लाल गुलाब।

केकरो माथमे अबीर भरल अछि
केकरो मुँह मलल अछि रंग
केकरो हाथ मलपुआ भरल
कियो पिबैत भरि लोटा भंग।
©जगदानन्द झा ‘मनु’

Saturday, May 24, 2014


Thursday, May 22, 2014

हमर अभिलाषा

हम तँ बनब किसान देशकेँ
अथवा बनब जवान देशकेँ।


माएक भूमिपर मऽरै बला
सत्य कर्म हिम्मत  बला
दुश्मनकेँ हम मारि भगाएब
हिम्मत अपन सभकेँ देखाएब
सोचल नै केखनो अनकर होएत
जखन हम देशक जवान होएब।

तनपर वर्दी होएत जखन हमर
मृत्युओ जीवन होएत हमर
अन्तिमो छनमे प्राण दए कऽ
देशकेँ नै हारब हम जी कऽ
छुल-छुल दुश्मन मूतत देख कऽ
जखन हम चलब सीना तानि कऽ।

हम तँ बनब किसान देशकेँ
अथवा बनब जवान देशकेँ।


घर-घर दाना पहुँचाएब अन्नकेँ
पुत्र बनि कए हम माएक भूमिकेँ
खून पसीनासँ धरतीकेँ पटाएब
कखनो नै मोनमे आलस लाएब
अन्न करब उपजा हम मनसँ
सजाएब सभटा सपना हम तनसँ।


प्रकृतिकेँ आगू नै हम झूकब
कर्म अपन हम निरन्तर करब
माँथ अपन ऊँच उठा कऽ
कहबै सभकेँ शान देखा कऽ
हम तँ छी किसान देशकेँ
कर्म जएकर सेवा खेतकेँ।


हम तँ बनब किसान देशकेँ
अथवा बनब जवान देशकेँ।
©जगदानन्द झा ‘मनु’

Wednesday, May 21, 2014

छुट्टी भऽ गेलै


टन टन टन टन घंटी बजलै
धिया पुताकेँ मनमा दोललै
मौलाएल मुँह झट हँसि गेलै
हजारो कमल जेना संग फूलि गेलै
हाथमे झोड़ा लए कऽ दौड़ल
खुशीसँ मोनमे दही पौड़ल
नै छै चिंता काल्हि की हेतै
नै छै चिंता आइ की हेतै
सबहक मोनमे खुशी छै ऐकेँ
छुट्टी भऽ गेलै आइ इस्कूलकेँ
छुट्टी भऽ गेलै छुट्टी भऽ गेलै
आइ इस्कूलकेँ छुट्टी भऽ गेलै
@ जगदानन्द झा ‘मनु’

Monday, April 28, 2014

प्रकृति

प्रकृति अहाँक कोरामे
की-की नुकाएल अछि नै जानि
देखी नजरि उठा कए जतए
नव-नव रंग-विरंगकेँ पानि

नुकाएल अनन्त ब्रम्हान्ड अहाँमे
कोटी-कोटी ग्रह नक्षत्र धेने छी
हमर मोनकेँ अछि जे हरखैत
एहन जीव चौरासी लाख धेने छी

श्यामल सुन्नर साँझक रूप
रौद्ररूप धारण अधपहरमे कएने
नव यौवन केर सभटा सुन्नरता
भोरक छविमे अहाँकेँ पएने

जाड़ गर्मी बरखा वसन्त
चारि अवश्था वरखक अहाँकेँ
माए जकाँ हमरा लोड़ी सुनबैत अछि
अन्न-धन दैत सभकेँ ई रूप अहाँकेँ
*****
जगदानन्द झा 'मनु'
               

Monday, March 31, 2014

कथा वाचन- लेखन पाठशाला (बाल कथाक विशेष संदर्भमे)

कथा वाचन- लेखन पाठशाला (बाल कथाक विशेष संदर्भमे)

मैथिलीमे कथा वाचन, विशेष क' नेना भुटका लेल बाल कथा वाचनक परम्परा बड्ड पुरान रहल अछि। लोक गाथाक रातिक राति, दिनक दिन प्रदर्शन, बाल सुलभ मोन लेल ओकर छोट वर्जनक गद्य- पद्य मिश्रित एक आ बेशी राति चलैबला दादी- नानीक कथा; दादी- नानी आ बाबा- बाबूक सुनाएल आन लोककथा एकर विभिन्न रूप अछि जे मिथिलाक बालक- बालिकाक मोन मोहने अछि।ऐसँ विपरीत सप्ता डोरासँ ल' ' मधुश्रावणी आ बिहुलाक कथाक जानकारी मात्र बालिके धरि सीमित अछि, एक्के घरमे रहितो किछुए बालक मौगियाहा संज्ञा भेटबाक डरक संग ऐ कथापाठमे सम्मिलित हेबाक साहस करै छथि।
कथाक बीच गीत, कहबी, खेल सेहो होइए। खेल कथाक बालक- बालिका संभ द्वारा वाचन- गायन होइत अछि, आ खेला सेहो चलिते रहैत अछि, कोनो दादी- नानीक प्रवेश नै, कोनो बाबू- बाबा बेदराक खेलमे घुसि नै सकै छथि।
कथापाठक एतेक सुन्दर परम्पराक अछैत मैथिली बालकथा किए असफल भ' गेल, बा अखन धरि असफल अछि। जँ लिली रे केँ छोड़ि दी तँ ई कहैत कनियो संकोच नै जे साहित्य अकादेमी पोषित, से ओ छपाई हुअए बा पुरस्कार, मैथिली बाल कथा साहित्य , बाल साहित्य अछिये नै। आ जँ अहाँमे प्रतिभा नै अछि तँ अनुवाद करू, मुदा प्रायोजित अनुवादक स्तर एहन जे बच्चाक बापक दिन नै छिऐ जे एक्को पैराग्राफ़ पढ़ि लिअए, तते ने मुँह कोचिआबए पड़ै छै।
साहित्य अकादेमीसँ २४ भाषासँ संकलित बाल कथा निकालल गेल। मैथिलीयोक कोटा छै आ रामदेव झा दुनू बापुतक बालकथा कोना नै रहत, नाटक संग्रह एतै तँ फट नाटक तैयार, तही तर्जपर। लिली रे क कथा मुदा सुन्नर अछि। मैथिलीक ऐसँ बदनामी होइ छै, दुनियाँ बुझैए जेमैथिलीक कथाकार बाल कथाक माने बुझबे नै करै छथि।
८२ म सगर राति बालकथा केन्द्रित रहत। ओइ संदर्भमे बाल कथा वाचन- लेखन पाठशालाक आरम्भ कएल जा रहल अछि।
विदेह शिशु उत्सवमे जगदानन्द झा 'मनु'क चोनहा आएल छलन्हि। बाल मनोविज्ञानपर आधारित ई उपन्यास बाल कथा लिखनहारक लेल पाठ्यक्रमक समान अछि, केना कथा आगाँ बढ़ाओल जाए, आ समाप्त कएल जाए, कथा वस्तुक नवीनता एकरा विशिष्ट बनबैए। विदेह शिशु उत्सव ऐ लिंकपर उपलब्ध अछि:-
https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/
से बालकथाक लेखन एना हुअए जे ओ पढ़ै आ सुनै, दुनूमे नीक लागए। ई क्लोजेट नाटक सन हेबाक चाही, जे मंचन लेल नै, असगरे पढ़बाले बा किछु गोटे संग ज़ोर- जोरसँ सुनबा- सुनेबा लेल लिखल जाइए।
सरल विचार, सरल शब्दावली आ सरल भाषा श्रेष्ठ बाल कथा लेखनक चाभी अछि।
जेना ऋगवेदक जल प्रलय, मनु आ महामत्स्यक कथा, सरस्वती नदी, अरायुक्त रथक विवरण, ई सभ आरम्भिक बाल कथाक आकृति देखबैत अछि तहिना अवेस्ताक गिलगमेशक कंथा सेहो। ऋगवेदोसँ पहिने गाथा, नाराशंसी आदिक मौखिक साहित्य छल आ ओइ लेल ऋगवेदमे गाथापति, गाथिन आदिक प्रयोग अछि।
"पंचतंत्र" आ ओकर किछु कथाक पुनर्लेखन "हितोपदेश" सँ बहुत पहिने जातक कथा बाल कथा कहलक आ सेहो चिड़ै चुनमुनीक संग मालजाल आ जानवरक माध्यमसँ, ओना जातककउद्देश्य बौद्ध धर्मक प्रचार सेहो रहै। अही तरहेँ पंचतंत्र बाल कथा कहैत कहैत स्त्री-शूद्रक प्रति पूर्वाग्रह कथामे पैसेलक, आ तेँ ओकर पुनर्लेखनक आवश्यकता अनुभूत भेल। ऋगवेदक आख्यान संवादकेँ जन्म दै छल, जे पौराणिक कथा ख़त्म क' देलक आ तेँ ओइ पौराणिक कथा सभक पुनर्लेखन अखुनका हिसाबे हेबाक चाही।
आधुनिक बाल कथा केहुन हुअए?
ओइमे आधुनिक विज्ञान द्वारा पसारल नीक तत्वक संग पर्यावरण चेतना सेहो हेबाक चाही। माने कथा बुद्धिपरक नै व्यवहारपरक हेबाक चाही।

बालकथामे मनोरंजन आ ज्ञानक समावेश लेल विज्ञान, समाज विज्ञान परक कथा लिखबाक आवश्यकता अछि। बच्चा अपन धरोहरिकेँ बुझए, तेँ लोक कथा, परीकथा, जादू कथा कहल जा सकैए मुदा ई अंधविश्वास नै बढ़बए तइ तरहेँ ओकर लेखन पुनर्लेखन हेबाक चाही।

Monday, March 24, 2014

82म “सगर राति दीप जरय” कथा गोष्ठीक हकार

हकार 
82म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक आयोजन मेंहथमे 31 मइ 2014 शनि दिन भऽ रहल अछि। ई आयोजन मेंहथमे 31 मइ 2014 संध्या ५ बजे सँ शुरू भऽ कऽ 01 अप्रैल 2014 भोर धरि हएत। ई विशुद्ध रूपसँ बाल कथा (विहनि आ लघु कथा) विशेषांक रहत। संयोजक- गजेन्द्र ठाकुर। अहाँ सभ कथाकार बाल कथा (विहनि आ लघु कथा)क संग सादर आमंत्रित छी।- आयोजक – गजेन्द्र ठाकुर 

८१म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक आयोजन देवघरमे २२ मार्च २०१४ शनि दिन संध्यासँ २३ मार्च २०१४ रवि दिन भोर धरि सम्पन्न। ई आयोजन देवघरमे बमपास टाउन स्थित "बिजली कोठी" नम्बर ३ मे श्री ओम प्रकाश झा जीक संयोजकत्वमे सम्पन्न भेल। ८२ म सगर राति ३१ मइ २०१४ केँ मेँहथ गाममे हएत। ई विशुद्ध रूपसँ बाल कथा (विहनि आ लघु कथा) विशेषांक रहत। संयोजक- गजेन्द्र ठाकुर।

८१म सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठीक आयोजन देवघरमे २२ मार्च २०१४ शनि दिन संध्यासँ २३ मार्च २०१४ रवि दिन भोर धरि सम्पन्न। ई आयोजन देवघरमे बमपास टाउन स्थित "बिजली कोठी" नम्बर ३ मे श्री ओम प्रकाश झा जीक संयोजकत्वमे सम्पन्न भेल।
८२ म सगर राति ३१ मइ २०१४ केँ मेँहथ गाममे हएत। ई विशुद्ध रूपसँ बाल कथा (विहनि आ लघु कथा) विशेषांक रहत। संयोजक- गजेन्द्र ठाकुर।

Saturday, February 16, 2013

होएत जँ

होएत जँ  (बाल कविता)

हाथक मुरली हमर खुरपी बनल
गोबरधन बनल अछि ढाकी,
प्रजा हमर सभ हराए गेल
माए बनल अछि बूढ़ीया काकी।

एखनो हम गाए चरबै छी
प्रिय नहि लम्पट कहबै छी,
इस्कूलक फीस दए नहि सकलहुँ
तैँ हम चरवाहा कहबै छी।

हमर गीतक स्वर महीसे बुझैत अछि
वा खेतक हरियर मज्जर, सुनि झुमैत अछि
 हमर बालिंग नही  लोक देखने अछि
भरि गामक बासनपर  लिखल अछि।

के लऽ गेल यमुनाकेँ दूर एतेक
जँ कनिको नाम हुनक हम जनितहुँ
हाथ जोड़ि दुनू विनती करितहुँ
यमुनाकेँ हुनकासँ हम माँगितहुँ।

हमरो गाममे जँ यमुना बहैत
विषधर कलियाकेँ हम नथितहुँ,
मुरली बजा कए गैया चरबितहुँ
यमुना कातमे हम नचितहुँ।

होएत जँ  हमरो माए यशोदा
सभक प्रिय हम बनितहुँ
होएत जँ दाऊ भाइ हमर
कतेक बलशाली हम रहितहुँ।
*****

जगदानन्द झा 'मनु'

Wednesday, December 19, 2012

विदेह मैथिली शिशु उत्सव (तिरहुता वर्सन)

तरेगन

मध्य प्रदेश यात्रा

देवीजी

मैथिली चित्रकथा

नताशा

Thursday, November 15, 2012

बाल गजल

चलै चुनमुन चलै गुनगुन तमासा घुमि कए आबी 
जिलेबी ओतए छानैत तोहर भेटतौ बाबी 

पढ़ैकेँ छुटल झंझट भेल इसकूलक शुरू छुट्टी 
दसो दिन राति मेला घुमि कए नव वस्तु सभ पाबी 

करीया बनरिया कुदि कुदि कए नाचै बजाबै बिन 
चलै चल ओकरा संगे हमहुँ नेन्ना कनी गाबी 

बनल मेनजन अछि बकड़ी पबति बैसल अचारे छै 
बरद सन बौक दिनभरि चूप्प रहए पहिरने जाबी    

बुझलकौ आब तोरो होसयारी 'मनु' तँ बुढ़िया गै 
लगोने ध्यान वक कतएसँ सम्पति नीकगर दाबी    

(बहरे हजज, 1222 चारि-चारि बेर सभ पांतिमे)

Tuesday, October 16, 2012

माटिक बासन


केदार प्रसाद गामक एकटा कुशल कुम्हार । माटिक बासन जेना  घैलढाकनमटकुरी बना अपन जीवन यापन करै छलाह । माटिक बासन बनेनाइ मात्र हुनक आजीवकाक साधन नहि भहुनका लेल  एकटा सुन्नर कारीगरी छल । अपन काज करैकाल ओ ऐना तनमय भजाइ छलाह जेना एकटा भक्त अपन अराध्य देवताक ध्यानमे अपन तन-मनक सुधि बिसैर जाइत छैक । ओ अपन स्वं साधनासँ धिरे-धिरे छठि मैयाक सुन्नर व आकर्षित हाथी सेहो बनबए लगला । हुनकर बनाएल माटिक बासन आ छठिक हाथीक बड्ड प्रशंसा होइत छल ।
धिरे-धिरे गामक परिवेश बदलए लागल । माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल । केदार प्रसादजीक आमदनी कम होबए लगलन्हि मुदा ओ अपन काजक प्रति  निष्ठा आ समर्पणकेँ दुवारे कुम्हारक काज नहि छोरि पएला ।
हुनक सुन्नर सुशिल बेटा बिभू नेन्नेसँ अपन पुस्तैनी काजमे माँजल । ई कहैमे कोनो संकोच नहि जे ओ अपन बाबूओ सँ बीसे । केदार प्रसादजी एहि गपकेँ नीकसँ  बुझैत अपन होनहार पुतकेँ गुणसँ मोने-मोन खुस छलाह आ चिंतीत सेहो । चिंतीत एहि दुवारे की कुम्हारक काजक कि बर्तमान छैक आ कि भबिष्य हेतै से हुनका बुझल मुदा बिभूक हस्तकौशल देखि ओकरा एहि काजसँ बाहर केनाइ उचित नहि बुझलाह । बिभू सेहो इस्कूल पढ़ाइक संगे-संग अपन बाबूक सभटा गुणकेँ  अंगीकार केने गेल ।  अपन  बाबूक छठिक हाथीसँ आगू बढ़ि ओ मूर्तिकलामे अपन हस्तकौशलक उपयोग करै लागल । ओकर बनाएल मूर्तिक चर्चा गाम  भरिमे होबए लगलै । जतए ओकर बाबूक बनाएल छठिक हाथीकेँ एगारह टाका भेटन्हि ओतए ओकर बनाएल छोट-छोट कनियाँ- पुतड़ा सभकेँ सय-सबासय टाका भेटअ लगलै । बिभू अपन बाबूक देख-रेखमे मूर्तिकलामे दिनो- दिन आगू बढ़ए लागल । आब ओकर बनाएल माए सरोस्वतीकृष्णास्टमीविश्वकर्मा पूजाक मूर्तिक माँग चारूकातक बीस गाम तक होबए लगलै मुदा बिभूक बाबू तैयो ओकर बनाएल मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकालि आ ओकरा अओर बेसी नीक मूर्ति बनाबैक प्रेरणा देथिन । बिभू सेहो हुनक गपकेँ मन्त्र मानि आगू आरो नीक मूर्ति बनाबएमे लागि जे ।    
बिभू दसम वर्गकेँ बाद इस्कूली पढ़ाइ छोड़ि पूर्णतः मूर्तिकलामे अपनाकेँ समर्पित कए लेलक । अठारहम बरखक पूर्ण बुझनूक भगेल आब ओकरा नीक बेजएकेँ ज्ञान भगेलै । ओकर मूर्तिक प्रशंषा आब गाम नहिजिला नहि राज स्तरपर होबै लगलै । आब  तँ ओकर बनाएल एक-एकटा मूर्तिकेँ दू-दू तिन-तिन हजार टाका भेटए लगलै । मुदा ओकर बाबू एखनो ओकर मूर्तिमे कोनो ने कोनो दोख निकाइल ओकरा आर सुन्नर मूर्ति बनाबैक निर्देश देथिन । पहिले बिभू हुनक गपकेँ मन्त्र मानि कमी दूर करैक चेष्टामे लागि  जाइ छल मुदा आब हुनक गपसँ ओकर मोन कतौ-ने कतौ आहत होइत छलै । मुदा बिरोध करैक सहाश नहि तेँ मोनकेँ मारि हुनक बताएल निर्देशमे लागि जाइ छल  
जेना-तेना काज आगू बढ़ैत रहल आ ओकर बनाएल गेल मूर्तिक चर्चा आब राजक सीमासँ निकैल बाहर दस्तक देबए लगलै । राजसरकारकेँ गृहमंत्रालयसँ बिभूकेँ पत्र एलै जाहिमे ओकर बनाएल गेल मुर्तिकेँ अखिल भारतीय मूर्ति प्रदर्शनीमे राखक व्यवस्था कएल गेल रहैक । सभटा खर्चा राजसरकारक आ विजेताकेँ देशक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकारक सम्मानकेँ संगे-संग एक लाख टाकाक नगद इनाम सेहो ।   ई पत्र पाबि बिभूकेँ बड्ड प्रसंता भेलै । सभसँ पहिले दौरल-दौरल अपन बाबूकेँ एहि गपक सुचना देलक । केदार प्रसादजी सेहो बड्ड प्रसन्य भेलाह हुनकर जीवन भरिकेँ मेहनत रंग लाइब रहल छल । बिभू राति-राति भरि जागि-जागि कए अपन मार्गदर्शक गुरु बाबू संगे लागि गेल ।
एकसँ एक नीक-नीक मूर्ति बनेलक मुदा केदार प्रसादजी सभ मूर्तिमे कोनो ने कोनो कमी निकाइले देथिन । केदार प्रसादजीक बताएल कमीकेँ दूर करैकेँ बदला  बिभूक मोनमे आब नकारात्मक प्रवृति घर करए लगले । हुनक बताएल कमीपर आब ओ सबाल-जबाब करए लागल । काइल्ह प्रतियोगता लेल मूर्ति भेजैक अंतिम दिन आ आइ बिभू अपन बनाएल मूर्ति सभमे सँ एकटा सभसँ नीक मूर्तिकेँ अंतिम रूप देबएमे लागि गेल । केदार प्रसादजी बारीकीसँ ओहि मूर्तिकेँ निरीक्षण करैतबिभूक दिमागमे हलचल चलि रहल छल - "हाँ आब तँ ई कोनो ने कोनो गल्ती बतेबे करता ।"
ततबामे केदार प्रसादजी अपन चुप्पीकेँ तोरैत बजलाह -"सुन्नर ! आइ तक बनाएल गेल मूर्ति सभमे सर्बश्रेस्थ ।कनीक काल चुप रहला बाद फेर -"  मुदा ।"
मुदा की आब  तँ  बिभूक मोन बिफैर गेलै - "अबस्य कोनो ने कोनो कमी गनेता ।"
केदार प्रसादजी अपन गपकेँ आगू बढ़ाबैत -ई जँ एना रहितेए तँ  आरो बेसी नीकआ ई रंग जँ फलाँ फलाँ रहथि तँ  जबरदस्त होइते ।"
नैन्हेटासँ जिनक गपकेँ मन्त्र मानि पूरा करैमे जि-जानसँ लागि जाइ छल आइ हुनक गपकेँ नहि पचा पएलक । बिफैर कए बाजि उठल -"रहै दियौ ! अहाँकेँ  तँ एनाहिते दोख निकालए अबैएअपन बनेएल ढाकन बसनी  तँ कियो एको टाकामे नहि किनैए आ हम केतबो नीक मूर्ति बना लि कोनो ने कोनो दोख अबश्य निकाइल देब ।"
बिभूक गप सूनिते मातर केदार प्रसादजीक शांत मुद्रा भंग भए सोचनीए भगेलनि । एकटा नमहर साँस लैत बिभूक पीठ ठोकैत बजलाह -"बस बेटा बस ! जहिया व्यक्तिकेँ अपन पूर्णताकेँ आभाष भजाइ छैक ओकर बाद ओकर जीवनक विकास ओतहिए रुकि जाइ छैक । पूर्णताकेँ आभास दिमागक आगू बढ़ैक चेतनामे लकबा लगादै छैक ।"
किछु छन चुप्प,दुनू गोटे शांत । बिभूक आँखिसँ नोर टघरैत जे आइ ई की कए लेलहुँओकरा अपन गल्तीक ज्ञान भगेलै । केदार प्रसादजी आगू - "हमर सपना छल जे हमर बेटा राजक आ देशक नहि वरण दुनियाँक सर्वश्रेष्ट मूर्तिकार  बनत.....मुदा नहि । कोनो गप नहि हमराकेँ जनै छल कियो नहि । हमर बेटाकेँ पूरा राज जनैत अछि एकटा नीक मूर्तिकारकेँ रूपमे । हमरा लेल बड्ड पैघ गप अछि । मुदा हमर सपना ------- आब नहि पूरा होएत । ई कहि ओ ओहि कक्षसँ बाहर भऽ गेला ।    
*****
जगदानन्द झा 'मनु'

Saturday, September 29, 2012

करुण हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह


पंजाब प्रान्तक राजा महाराजामे सँ महाराज रणजीत सिंहक नाम हुनक न्यायप्रियता एवं सुशासनक लेल पसिद्ध छनिएक समयक गप अछिमहाराज रणजीत सिंहजी अपन प्रजाक सुख दुख देखै लेल घोड़ापर सबार अपन सिपाही संगे राज भ्रमपर निकलल रहथि |महाराज सेना सहित रस्तापर आगू  बढ़ैत रहथि की कतौसँ एकटा पाथर उड़ि कआबि महाराजकेँ बिच्चे माथपर लगलनिपाथर लगिते हुनकर माथसँ सोनितक टघार बहए लगलनिमहाराज अपन एक हाथसँ घोड़ाक लगाम पकड़ने, दोसर हाथे चट कपारकेँ दाबि लेलनि |सिपाही सभ पाथरक दिसामे  दौड़लकिछु घड़ी बाद ओ सभ एकटा नअ-दस बरखक फाटल चेथड़ी पहिरने, गरीब नेनाकेँ लेने आएल|महाराजकेँ पुछला उत्तर एकटा सिपाही बाजल जे ई नेना पाथर मारि-मारि कए आम तोड़ै छलओहे पाथर आबि कमहाराजक माथपर लागल महाराज रणजीत सिंह ओ डरैत नेनाकेँ अपना लग बजास्नेहसँ ओकर माथपर हाथ फेरैत एगो सिपाहीकेँ आज्ञा देलनि - "पाँच पथिया आमदू जोड़ी नव कपड़ा आ सटा असरफी लए क नेनाकेँ आदर सहित एकर घर छोड़ि आएल जा|
महाराजक आज्ञाक तुरंत पालन भेल मुदा महाराजक निर्णयकेँ नै बुझि सेनापति, सहास कए क तरहक फैसलाक कारण पुछिए लेलक|सेनापतिक प्रश्नक उत्तर दैत महाराज बजलाह -"जखन एक गोट निरीह गाछ पाथर माला उत्तर फल दरहल छै तखन हम तँ ऐप्रान्तक राजा छीहमर प्रजा हमर पुत्र तुल्य अछि, एहन ठाम हम कोना फल देबसँ वंचित रहि जाइ गाछ अपन सामर्थे फल दै छै, हम अपन सामर्थे, मे अजगुतक कोन गप|
एहन उदारन्यायप्रियवात्सल्य आ करुण ह्रदयक मालिक छलाह महाराज रणजीत सिंह |   
            

शंकल्पक धनी विल्मा रुडोंल्फ




बिल्मा रुडोंल्फक जन्म तेनेसेस शहरकेँ एक गोट गरीब परिवारमे भएलैंह | चारि बरखक अबस्थामे डबल निमोनियाँ आओर कालाजारक प्रकोपक संगे-संगे ओ पोलियोसँ ग्रस्त भs गेलिह | ओ अपन दुनू पएरकेँ सहारा देबैक लेल ब्रैस पहिरैत छलिह | डाक्टर  तँ  एते तक कहि देलकैन्ह जे ओ जीवन भरि अपन पएर सँ चलि फिर नहि सकतिह, मुदा हुनकर माए हुनका हिम्मत बढ़ेलखिन्ह आ कहलखिन्ह -"दृढ़ शंकल्प, लगन,  कठिन मेहनत सँ जे कोनो काज कएल जाए भगवान ओकरा अवश्य पूरा करैत छथिन्ह |'' इ गप्प सुनि विल्मा निश्चय कएलैन्ह जे ओ दुनियाँकेँ सभसँ तेज धाविका बनतिह |
नअ बरखक अबस्थामे डाक्टरक मना कएला बादो ओ  अपन पएरक ब्रैस उतारि कs अपन पहील डेग जमीनपर बढ़ेलीह | १३ बरखक अबस्थामे अपन पहील दौड़ प्रतियोगतामे भाग लेलैन्ह आ सभसँ पाछू रहलीह | ओकर बाद दोसर, तेसर, चारिम, पाँचम प्रतियोगता सभमे भाग लैत रहलीह आओर सभसँ अन्तिम स्थानपर आबैत रहलीह | आ इ प्रयास ताबत तक रहलैन्ह जाबत कि ओ दिन नहि आबि गएल जहिया ओ प्रथम एलीह
१५ बरखक अबस्थामे विल्मा टेनिसी स्टेट यूनिवर्सिटी गएलीह, जाहि ठाम हुनक भेट एडटेम्पल नामक एकटा कोचसँ भेलैन्ह | हुनका ओ अपन मोनक इच्छा बतेलीह, जे ओ दुनियाँकेँ सभसँ तेज धाबिका बनऐ चाहैत छथि | हुनक दृढ़  इच्छा शक्तिकेँ देखैत टेम्पल हुनक कोच बनब स्वीकार कएलैन्ह |
अंतमे ओ शुभ दिन आएल जहिया विल्मा ओलम्पिकमे भाग लs रहल छलीह | ओलम्पिकमे दुनियाँकेँ सभसँ तेज दौड़ए बला सभसँ मुकाबला रहैत छैक | विल्माक मुकाबला जुताहैनसँ छलैन्ह जिनका कियो नहि हरा पएने छल |  पहील दौड़ १०० मीटरकेँ छल जाहिमे बिल्मा जुताहैन केँ हरा कs पहील स्वर्णपदक जितलीह | दोसर दौड़ २०० मीटरकेँ एहुमे विल्मा, जूताकेँ दोसर बेर हराकए अपन दोसर स्वर्णपदक जितलीह | तेसर आ अन्तिम दौड़ ४०० मीटर रिले रेस छल आ विल्माक सामना एकबेर फेरसँ जुतासँ छलैन्ह | एहि अन्तिम आ निर्णायक दौड़मे टीमक सभसँ तेज धाबिकाकेँ बिच सामना छल | दुनू टीमसँ चारि चारिटा सर्बश्रेष्ठ धाविका, करू अथवा मरुक मुकाबला | विल्माक टीमकेँ तीनटा धाविका  रिले रेसकेँ  शुरूआती  तिन हिस्सामे दौड़लीह अ आसानीसँ बेटन बदललीह | जखन विल्माकेँ दौड़क बेर एलैन्ह तँ हुनकासँ बेटन छूटि गएलैन्ह मुदा ओ अपनाकेँ सम्हारैत, खसल बेटन शिर्घतासँ उठाबैत मशीन जकाँ  तेजीसँ दौडैत जुताकेँ तेसरो बेर हरा कs तेसर गोल्ड मेडलक संगे-संगे दुनियाँकेँ नम्बरएक धाविका बनि अपन सपना पूरा करैत इतिहासक पन्नामे अपन नाम स्वर्ण अक्षरसँ  लिखेलथि |
ई अमीट इतिहास १९६० कए ओलम्पिककेँ अछि जाहिमे एकटा लकबाग्रस्त महिला दुनियाकेँ  सर्वश्रेष्ठ धाविका बनल छली | एहेन सफल व्यक्तिक खिस्सासँ अपनों सभकेँ मोनमे सफलता प्राप्तिक लालसा अबस्य जागल होएत | कठिनाई सफलताक पहील सीढ़ी छैक,   दृढ़ शंकल्प आ विश्वासक संग डेग आगु  तँ बढ़ाऊ सफलता अहाँक चरण चूमत |