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Tuesday, January 27, 2015

बाल गजल

नानी गेलै देखै लेए बारीमे आलू
लाइ उठा क' ओकर भगलै लालू

आँखि मुनि चारमे बेंग नुकाबै छै
कालू कौआ बनल कतेक छै चालू

केहेन होइ छै ई भोटक नाटक
बनि गेलै राज मंत्री चोरबा कालू

झट पट नेना सभ दौड़ क' आबै
देखही देखही कते नचै छै भालू

' दे नानी आब 'मनु'केँ दू रुपैया
नै सोचै मनमे कोना एकरा टालू

(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१३)
जगदानन्द झा 'मनु'

Thursday, November 15, 2012

बाल गजल

चलै चुनमुन चलै गुनगुन तमासा घुमि कए आबी 
जिलेबी ओतए छानैत तोहर भेटतौ बाबी 

पढ़ैकेँ छुटल झंझट भेल इसकूलक शुरू छुट्टी 
दसो दिन राति मेला घुमि कए नव वस्तु सभ पाबी 

करीया बनरिया कुदि कुदि कए नाचै बजाबै बिन 
चलै चल ओकरा संगे हमहुँ नेन्ना कनी गाबी 

बनल मेनजन अछि बकड़ी पबति बैसल अचारे छै 
बरद सन बौक दिनभरि चूप्प रहए पहिरने जाबी    

बुझलकौ आब तोरो होसयारी 'मनु' तँ बुढ़िया गै 
लगोने ध्यान वक कतएसँ सम्पति नीकगर दाबी    

(बहरे हजज, 1222 चारि-चारि बेर सभ पांतिमे)

Wednesday, August 8, 2012

गजल

बाल गजल-७

संचमंच भऽ रह्बौ सदिखन आब नै करबौ हुलहुल गै
मोन लगा कऽ पढ़बौ देखिहन्हि जेबौ सभ दिन इसकुल गै

संगी संगे हिल - मिल रहबै पैघ के सभटा कहल करबै
कान पकड़लौं आब ने करबौ बदमाशी हम बिलकुल गै

खाय-काल नकधुन्नी केलहुं तैं लटि कऽ हम एहन भेलहुं
डाँड़ सँ पेंटो सर-सर ससरल अंगो होई छै झुलझुल गै

सागो खेबय सन्नो लेबय आब नै कखनो मुंह बिचकेबय
परसन देऽ तीमन - तरकारी दालि दे आरो दू करछुल गै

दूध पीबि हम सुरकब दही खूब खेबय खाजा-पनतोआ
तइ पर सँ हम आमो खेबऊ पीयर-पाकल गुलगुल गै

देह्गर-दशगर संगी-तुरिया हमरा आंइख देखाबै जे
कसरत करबै देह बनेबै करतै डरे ओ छुलछुल गै

आशीर्वचन तोहर अमृत सन आँचरि आँगन ममता के
राजा बेटा "नवल" तोहर माँ चहकत बनि
कऽ बुलबुल गै

***आखर-२३
सरल वार्णिक बहर
©पंकज चौधरी (नवलश्री
(तिथि- १२.०७.२०१२)

गजल

बाल गजल-८

आमक गाछपर झूला लगाएब ना
अपनों झूलब सभके झुलाएब ना

केरा डम्फोरि आ लत्ती मोटका आनब
सउन बाँऽटि कऽ जउड़ बनाएब ना

कखनहुं ऊंचगर निच्चा कखनहुं
झूले संग हमहुँ आएब-जाएब ना

खसतय गोपी धऽपर -धऽपर- धप
झूला के बहन्ने ठाईढ डोलाएब ना

कियो बीछय
गोपी हेतै नहि झगड़ा
हम सभ संगी मिल-जुलि खाएब ना

कसि-कसि कऽ आर झूलाबय हमरा
ऊँचगर जा हम चान के पाएब ना

ठाढ़ि ओदर
तय झूला जों टूटतय
"नवल" चट सभ दौड़ पड़ाएब ना

***आखर-१४
सरल वार्णिक बहर
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-१४.०७.२०१२)

गजल

बाल गजल-९

इसकुल के बस्ता छै भारी हम नञि टंगबौ टांगै तू
पाइनक थरमस हमरा चाही माँ दऽ दे नै मांगै तू

मोरक चित्र बना कऽ आनऽ देलथि हमरा मैडम जी
फोटो तोड़े पाड़य पड़तउ सुन लेकिन नै रांगै तू

छिट्टा तर जे धैल नुका कऽ भनसा घर गमकलै माँ
संग सोहारी पाकल कोआ खेबय कटहर भांगै तू

ओलती के काते-काते हम ठाढि गुलाबक रोपने छी
ओरिया कऽ धान पसारय माँ फूलक गाछ नै धांगै तू

"नवल" छोट नञि आब ओते काज अढा किछ हमरो
हमरा हाथ पघरिया दऽ दे माँ जारणि नञि पांगै तू

***आखर-२०
(सरल वार्णिक बहर)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि :२७.०७.२०१२)

गजल

बाल गजल-१०

काँचे खटहा सरही पड़ में मारय मूस हबक्का यौ
लड्डूओ नञि खा हेतय ओकरा दांत कोंतेतै पक्का यौ

राति दिवालिक दीप जड़ेबै खेबै हम बताशा लड्डू
हुक्कालोली गेनी भंजबय फोड़बय खूब फटक्का यौ

चिप्स-चरौरी चूड़ा भूजल लागत करू तइयो खेबै
बीछ-बीछ मिरचाय दीयउ भूजा हमरो दू फक्का यौ

बारी में जा कोना चलेबै अप्पन छोटकी कठही गाड़ी
माटिक नमहर ढेपा तर फँसतै गाड़ी के चक्का यौ

पन्नी ताकू गेन बनाकऽ अंगनें में किरकेट खेलेबै
गेंद दियौ गु
ड़कौवा हमरा हमहूँ मारब छक्का यौ

बंटी सँ नञि मीत लगेबै सी नम्मर के छै बदमाश
अपने मारि बझाबै सभ सँ हमरा कहै उचक्का यौ

इस्कुल के बस्ता में राखल मुरही नै मसुवाई कहीं
"नवल" हाट के बाट तकै छै कचरी आनब कक्का यौ

***आखर-२०
(सरल वार्णिक बहर)
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि :२७.०७.२०१२)

बाल गजल

बाल गजल-५
कीन दे कचरी-झिल्ली-बऽरी लवणचूस आ कुट-कुट माँ
लोढि बाधसँ धान जे अनलौं भूजि दे मुरही भुट-भुट माँ
धान अगोअं के जे उसरगल तकर कीन दे फीता-बाला
काकी जे देलखिन्ह बाला से हाथमें होई छ छुट-छुट माँ
ललका फीता गूहल जुट्टी तेल सँ माथा गमकै गम-गम
थकरै केश जहन ककबा लऽ ढील केऽ मारै पुट - पुट माँ
देखि भूख सँ लोहछल नेन्ना दुःख-सुख सभटा लोप भेलै
भंसा घर में घाम सँ भीजल काज करै सभ चुट-चुट माँ
होय कहाँ अनका देखबैलै "नवल" इ मायक माया-तृष्णा
भेड़ निन्न तइयो कहि खिस्से दूध पियाबय घुट-घुट माँ
***आखर-२२
(सरल वार्णिक बहर)©पंकज चौधरी (नवलश्री)(तिथि-२४.०६.२०१२)

बाल गजल


बाल गजल-४

मोन पड़ल ई कियै अनेरे बात पुरनगर बचपन के
आंखि नोरेलै मोन जड़ेलक याद रमनगर बचपन के

बचपन दाबल - गाड़ल - बिसरल यौवन के मादकता में
खोलि रहल छी खाली मोटरी बैसल असगर बचपन के

बाबुक-कनहा मायक-कोरा अनुपम झूला सन घुआ-मुआँ
ता-ता-ता थैया आर ठेहुनिया खेल छमसगर बचपन के

ठकि-फुसला क कते खुयेलइन्ह दूध-भात आ गूड़क पूआ
चंदा-मामा सन मौसी-बिलाय नेह हिलसगर बचपन के

बस फूईसक खेती द्वेषक दोषी "नवल" जुआनी निर्संतोषी
धाह जुआनिक जड़ा गेलै ओ गाछ झमटगर बचपन के

***आखर-२३
(सरल वार्णिक बहर)©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-
१७.०६.२०१२)



बाल गजल

बाल गजल-३

अहि बाटी मे अगबे रोटी चिन्नी संग-संग दूधो कम
ई बाटी छऊ तोहर भईया ई बाटी नहि लेबौ हम

चोरा-चोरा क चिन्नी फंक्लैं माँ के जा कहि देबौ हम
नञि त एकटा फाँक अचारक दे उताइर क खेबौ हम

खुरलुच्ची बनि लुच-लुच करबैं नानी मोन पड़ेबौ हम
आब जों बिठुआ कटबैं भैया दांते कैट कनेबौ हम

सुन गे बहिना तोरो अहिना कहियो मजा चखेबौ हम
ककरो स जो झगड़ा हेतौ आब नञि तोरा बचेबौ हम

हासिल पड़का जोड़ ने कहियो तोरा आब बतेबौ हम
चलहिन इस्कूल मैडम जी सँ पक्का माईर खुएबौ हम
©पंकज चौधरी (नवलश्री)
(तिथि-०५.०४.२०१२)

Tuesday, July 31, 2012

बाल गजल

         बाल -गजल
कंटीरबा आ कंटीरबी माँ  बापक लेल दुनू आँखिक पुतली
एकटा अछि हीरा त' दोसर मोती भेल दुनू आँखिक पुतली

बौआ खेलय गेल गेंद कब्बडी  बुच्ची खेलय कनिआ-पुतरा
डाँर में घुघरू पैर  पाजेब बाजि गेल दुनू आँखिक पुतली

ठुमैक  चलै अछि बौआ ललन छ्मैक चलै बुच्ची लालपरी
जुडबै छाती माँ के बापक ओ शान भेल दुनू आँखिक पुतली

बौआ खेलक खोआ मिश्री बुच्ची खेलक  करकर कचरी माछ
फरिछ बाजै बुच्ची बौआ त' तोतला गेल दुनू आँखिक पुतली

रूबी लेल दुनू गौरब छै बौआ  राजाबाबू बुच्ची छै लालपरी
बनै कोनो हाकिम बच्चे माँ बाप लेल दुनू आँखिक पुतली
वर्ण-२३
रुबी झा

बाल गजल

   बाल  गजल
  हेरौ बौआ तूँ ऐना रुसल छेँ किए
  दूध-भात लेल तूँ बैसल छेँ किए

  मुँहमें खूएब आ कोरा बैसाएब
  गए कें दूध लेल अरल छेँ किए

   किन देब गेन लाल आ घुरकुन्ना
   छोर ने जिद्दपन डटल छेँ किए

  आबो दहुन बाबा के देठुन पेंरा
  पेंरा सन नीक कि नाठाल छेँ किए

  कहबै नाना कें देथुन धेनु गैया
  आबो बरेडी पर चढ़ल छेँ किए
  वर्ण-१३
  रूबी झा

बाल गजल

       बाल-गजल

हे रौ गुलेटेनमा  सुन रौ टुनटुनमा एलै छुट्टी गर्मी  क'
चल इस्कूल क' कहिये हम टाटा आब भेलै छुट्टी गर्मी क'

अन्हर बताश में खूब हम घुमब गाछी जा आमो चुनब
पाकल आमक रस निचोरब आई चढ़लै छुट्टी गर्मी क'

मेघ बुन्नी में खूब नहायेब माई क' हम बातो नै मानब
हत्ता-खत्ता में चल मान्छ जा' क' मारब बढ़लै छुट्टी गर्मी क'

हाट बजार में त' बाबु संग जेबै लेमंचुस बिस्कुट खेबै
मेला में जा' क' हम झुला झुलब कम बचलै छुट्टी गर्मी क'

इस्कूल क' गृहकार्य बांचल अछि रत्तियो नै त' वक्त छैक
अछि मोन विधुआयेल किये ख़तम भ' गेलै छुट्टी गर्मी क'

सरल वार्णिक बहर वर्ण -२२

रूबी झा

बाल गजल

बाल गजल
जए दे हमरो िददी केर सासुर गै माँ
हमहु खेबै माँछ भात आ काकुर गै माँ

ओझा भए के संग खेलेबै हम कबड्डी
बहिनक संग पकड़बै दादुर गै माँ

दी देलकै चुप्पे िचट्ठी देबै जा ओझा  क
भेन्ट करै ल दिदी  भेल छै आतुर गै माँ

बहला फुसला मना ओझा  के ल आनब
ध िघसीया क आनब नै त पाखुर गै माँ

जुनि खिसियो माँ हमहूँ बड़का भेलौं
मुँह फुला बैसै नै हो पित्ते माहुर गै माँ
आखर~१५
रुबी झा

बाल गजल

**बाल गजल**
हमर फुलबािर क दु टा अछि  फूल 
एक्टा  गेना दोसर  अिछ  अरुहूल

छोट ऊिमर कतै करए  पैघ बात
माँ हम छी अहान्क चरण केर धूल

पढी िलखी माई बनब हम साहेब 
खोईन्छ मे कमा क देब पाई समूल

बर तािक बहिन क करब िबयाह  
पढ िलख ल भैय क पठैब ईस्कुल

सुिन सुिन सभ क लागै छैक हैरत
करेज सटा नेना क माँ भेली व्याकूल

जुगे िजबु बेटा िलआ अशेष आशीष
भेल सबटा रुबी केर त्याग असूल
आखर~१४
रुबी झा

बाल गजल

बाल गजल
टुअर टापर बहिन कs टुअरे एकटा भाई छैक 
सड्क कात मे बैस कs कोना झिल्ली मुरही खाई छैक

माँथ मे नै तेल छैक एको बुन छिट्टा जकाँ केश छैक
सभ कियो  क रहतो ओ केहन टुअर बुझाई छैक

तन नै  चिथरो देने पढेता लिखेता की साढ़े बाईस
देशक भविष्य देखियौ किये एहन  कs घिनाई छैक  

दर्जन पुराब मे निर्लज्ज कs लागये छै मोन कतेक
छी तs हम बड्क़ा एको बेर कहितो नै लजाई छैक

कतबो करता बाप- बाप रोकल जाई जनसंख्याँ
पढ़ल लिखल गदहा एता  बड़ बेशी देखाई छैक

कतै करब बखान मातबरी मे नुकैल गरीबी कs
नेना सभक दशा देखि 'रुबी' कs किछ नै फुराई छैक
आखर --२०
रूबी झा

बाल गजल

       बाल गजल
मए गै आकाश सौ ओ चन्ना मंगा दे 
हनुमान जी ध्वजा केर फन्ना मंगा दे

रोज ईस्कुल जा क भ गेलहु हरान  
सर सौ आई छुट्टी क बहन्ना मंगा दे

दाई केलेन अनोना माँ क एकसन्झा
दाई आगु सौ आलू केर सन्ना मंगा दे

िददी खेलक बर्फ ललका धान बेिच 
हमरो कनेक दाई सौ मरधन्ना  मंगा दे

नै िलखब िसलेट पर नै चोक माटी
बाबु सौ कलम एकोटा  पन्ना  मंगा दे
आखर~१४
रुबी झा


Monday, July 30, 2012

बाल गजल

बाल गजल

आ रौ छौरा बान्हि दियौ तोहर हम झोट्टा रौ
ढील लिख सोहैर गेलौ आब हेतौ जट्टा रौ

हे रौ कने छौरा क पकैर क आन भगतौ
देख त कैस क पकर जा ओकर गट्टा रौ

दलान पर सौ बजा आनलौ फेर भगलै
आब जौ पकरबौ त तोरा मारबौ सट्टा रौ

इ बेर दुर्गा मे कटबा देब तोहर लापेट
छागरो त दाई कबूलने छथुन जोट्टा रौ

छोर नै छूबौ तोहर केश खए ले कने आ
राखने छी आ नै चुरा दही भ जेतौ ख्ट्टा रौ

आखर~१६
रुबी झा

बाल गजल

बाल गजल

बुच्चीया हम्मर रुसल छै
मुहं नुका कोना सुतल  छै

कािन रहल छै झुठे मुठे
गेरुआ सौसे त िभजल छै

सोना क हम लेब नथुनी
ओही बात पर अरल छै

नै बुझै त ओ बात ककरो
नाको कान नै त छेदल छै

दाई दौर बैसैलन कोरा
कािन िजह्वा तालू सटल छै

बाबा गेलेन सोनरा ओत
रौ हम्मर बुच्ची रुसल छै

िपतरो के तौ द दे नथुनी
ओ सोने सन जे गढल छै

बाप माई सब भेल थौआ
बुच्चीया मना क थाकल छै

नाक मे लटका क नथुनी
िजद्दे बुच्ची रुबी हारल छै

आखर~१०
रुबी झा

बाल गजल

बाल गजल

निन्न सँ मातल अछि बौआ आबि क सूताऊ यै
कतय गेलि बौआ मए ओछैन त ओछाऊ यै

खेलके नै ओ दिने सँ केहेन कठोर माई छी
भेल नै भानष त चूरे ढूध नेना बुझाऊ यै

खन बाबा खन हमरा कोरा झुकि खसय छै
अहाँ झट सँ जा किछ त बौआ क खुआऊ यै

कते महग गए किनलौं दुलरा पोता लेल
नेना काया में दूध बुन्न नै झट सँ पिआऊ यै

आबू यौ बौआ हमही दै छी अहाँ क दूध पिआ
कनि ''रूबी''आबि नेना क लोडियो त सुनाऊ यै
आखर -१७
रूबी झा

बाल गजल

बाल गजल

चलहिंन आई तौ गाम पर खुयेबौ हम तोरा माइर गै
चोरी क के हाथ नुका के बड़ बनल छै तों होशियाइर गै

पहिने खेत सँ मटर चोरेलै गाछक तों बैर झटाहलै
हम जौं माँगी तोरा सँ त बिखिन्न बिखिन्न पाढ़े छै गाइर गै

नाना क देलहा फराको तों फारलही माँ क जा कहबो हम
अपनों तोरा कांट गरलौ बैरो क तोड़लहिन डाइर गै

मोन छौ की उलहन माँ क बटेदार सँ सुनेबे करेभिन
सौंसे देह त चुट्टा बिन्हलकौ कतेक चलबें तों झाइर गै

पढ़ लिख में नै मोन लगे छौ उचक्की बनि घूमल चलै छै
के तोरा सँग बियाहो करतौ कोना बसबें ससुराइर गै

आखर -२२

रूबी झा